सुबह के चार बज रहे थे। मैं बाबा के साथ, घर के बाहर ही जो आँगन था वहाँ खेल रहा था। मूसलाधार बारिश हो रही थी। बाबा मेरे मुँह पर बारिश का पानी फेंक कर मुझे चिढ़ा रहे थे।  तभी मुर्हिका ने मेरी जांघ हिला कर मुझे पुकारा और मुझे नींद से जगा दिया।

मुर्हिका बोली, “भैया! बारिश हो रही है। छत से पानी टपक रहा है!” बारिश की बूंदों ने मुझे और मेरी बहन, मुर्हिका को भीगा दिया था। मैंने चारपाई को कमरे की खिड़की से सटा दिया। इस कमरे की छत का कोना बारिश के बहाव से बचा हुआ था। 


बारिश की बूंदों ने मुझे और मेरी बहन, मुर्हिका को भीगा दिया था।


आषाढ़ का महीना आ गया था। शहरों की तरह यहाँ किसी के पास महीने देखने के लिए ना तो कैलेंडर होता और ना समय देखने के लिए घड़ी। आसमान को देखकर ही सब सही अनुमान लगा लेते थे।  “मोमी…!!!”  ‘मुर्हिका’, मेरी बहन प्यार से मुझे मोमी बुलाती है। वैसे मेरा नाम मोमूर है। मुर्हिका ने फिर मुझे पुकारा और बोली, “मोमी! कहाँ खोए हुए हो! आज रात आसमान बहुत साफ़ होगा ना। बहुत सारे तारें नीले आसमान में टिमटिमाएंगे । तुम अपने बक्से से दूरबीन निकालो ना आज।”


आज रात आसमान बहुत साफ़ होगा ना। बहुत सारे तारें नीले आसमान में टिमटिमाएंगे। तुम अपने बक्से से दूरबीन निकालो ना आज।”


बारिश से मेरा ध्यान हट गया था। मैंने उसकी तरफ़ देखा और कठोर आवाज़ में पूछा, “कौन सा बक्सा?”  वह बोली मुझसे, “मासूम मत बनो”।  मैं उठ कर ट्रंक के पास गया, चलते-चलते मुड़कर मैंने  मुर्हीका से कहा, “मेरे सामान को हाथ मत लगाया कर।” धूल भरी चादर हटा कर मैंने अपना ट्रंक खोला। मैंने अपना लाल और हरे रंग का बक्सा अंदर से निकाला, तो मुझे याद आया। मैंने फिर उसकी तरफ़ मुड़ कर देखा और मज़बूत- दृढ़ आवाज़ के साथ कहा, “मुर्हिका! मां को मत बताना!” “क्या ना बताऊं”, उसने कहा। “तुम्हे पता है, मासूम मत बनो!”, मैंने कहा। “मैंने कुछ देखा ही नहीं!”, मुर्हिका ने बोला। मैं उसकी तरफ़ भागता हुआ गया और उसका कान मरोड़ कर मैंने उसको कहा, “मैंने देखने की बात कब कहीं।”  “छोड़ो मेरा कान, मैंने बोला छोड़ो नहीं तो मैं माँ से कह दूंगी कि तुम धूम्रपान कि लत लग गई है…” मुरहिका दर्द के मारे चिल्लाई और फिर से बोली, ” जब माँ तुम्हारा कान मरोड़े गी ना, तब मज़ा आएगा!”  “अच्छा ठीक है, ले चलूंगा तुझे दूरबीन से तारें दिखाने”, यह कह कर मैंने हार मान ली।

इतनी-सी देर में शोरगुल सुन कर माँ कमरे में आ गईं और पूछा, “क्या हुआ! सुबह के पांच बजे बस हमारे ही घर से इतनी आवाज़ आती होगी। चलो दोनो नहा कर तैयार हो और मेरी मदद करो।”हमारे गांव, ‘बरसीया’ में सबसे पहले सूरज उगता है। तो मानो अब कुछ पौने पांच बज रहे होंगे। माँ और मुर्हिका दोनो हरश्रृंगार के सफ़ेद फूलों को धागे में पिरो  कर मालाएं बना रहे थे। मैं बस बाहर नहा कर आया ही था कि माँ ने मुझे फूलों की एक थाली तैयार करने को कहा- धूप, माला, कटोरी में पानी और कुछ पैसों के साथ। माँ हर सुबह हमे अपने साथ मंदिर ले जातीं और उनकी खुशी के लिए मैं उनके साथ चला भी जाता, बिना ना-नुकुर किए। पर सच कहूं तो मेरा अपना भी स्वार्थ छुपा था। मंदिर एक तंग रास्ते के अंत में स्थित था। खास बात उस गली की यह थी कि वह दोनों तरफ़ से लंबे घने पेड़ों से लदी हुई थी। उन्हीं पेड़ों के नीचे  घने फूलों की झाड़ियां थीं, जिन पर कई रंग बिरंगी तितलियां मंडराती रहती थीं। बहुत से कृषकों ने कोशिश की कि वह फूल हमारे गांव के अन्य स्थानों में भी लगाए जाएं। पर किसी भी दूसरी जगह की मिट्टी इन फूलों को जमती नहीं। कहते हैं कि एक याचक कई साल पहले यहाँ आया था, भूखा और प्यासा, मरने की कगार पर।जितने भी लोग थे वह सब अपने घर से कुछ न कुछ उसके खाने के लिए लेकर आए। याचक ने पेट भर के खाया, पर एक दिन बाद वह मृत पाया गया। जब उसका शरीर जलाया गया, तब उसकी राख में से इन फूलों और तितलियों ने जन्म लिया। तब से यह यहां पर हैं। इसमें कितनी सच्चाई है यह कोई नहीं जानता, पर सब यकीन करना चाहते हैं क्योंकि यह जादू से कम नहीं। 


मंदिर से वापस आकर हम ने माँ का घर के दूसरे कामों में हाथ बटाया, जैसे चने सुखा कर सत्तू बनाना, गार्डनिंग करना और वह सब कुछ किया जिसको हमें शहर में करने के लिए समय नहीं मिलता था। सूरज ढलने ही वाला था। 

मोमूर: “मुर्हिका!! जल्दी चल रात होने से पहले भर्ती आना है।” 
मुर्हिक: “भैया पर हम जा कहाँ रहे हैं?” 
मोमूर: “कब्रिस्तान!”
मुर्हिका: “क्या! हमारे घर के बाहर भी तो वही आसमान है! कब्रिस्तान जाने की क्या जरूरत है!” 
मोमूर: “मोहम्मद मियां से मिलवाऊंगा!”
मुर्हिका: “कौन मोहम्मद मियां?”
मोमूर: “जो कब्र नंबर 145 में रहते हैं।”
मुर्हिका (डरी हुई): “मोमी!!! मेरा दिल बाहर आ जाएगा!” 
मोमूर ( हंस कर बोला): “अरे! मोहम्मद मियां का बहुत बड़ा घर है । सबसे ऊंची छत उन्हीं के घर है। वहां से तारे देखने का मज़ा ही कुछ और है!”
मैंने बिस्तर पर रखी उसकी गुड़िया को उठाकर उससे कहा, “यह ले अपनी गुड़िया, डर लगे तो इससे खेल लेना। पता है  – उनके पास टीवी, म्यूजिक सिस्टम, सब है!”  इतना ही कहना था मुझे कि मुर्हिका की आंखें चमक उठी। 
मोमूर (चिढ़ाते हुए): “पर अगर तुझे वहां चमगादड़ ने पकड़ लिया तो मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा।”
मुर्हिक: “मोमी!!!”

मोहम्मद मियां के कब्रिस्तान हम पहुंच गए थे। कब्रिस्तान के भीतर ही उनका घर था। मोहम्मद मियां से पूछो अगर, “आपको यहां रहने में डर नहीं लगता?”, तो वह झट से कह देते, “डरने से क्या डरना! जो ज़िंदा है उनका डर है, मरे हुए का कोई डर नहीं होता।”  मैंने अपना पिटारा खोला, उसमें से दूरबीन निकाली और मोहम्मद मियां और मुर्हिका के साथ बैठ गया। मुर्हिका को आकाश के बारे में जानने के बहुत उत्सुकता थी। मुझे लगता है हम दोनों में यह गुण बाबा से आया था। हर बार जैसे मैं बाबा से नक्षत्रों, धूमकेतु, ग्रहों के बारे में प्रश्न पूछता, वैसे ही वह भी मुझसे पूछती।

“डरने से क्या डरना! जो ज़िंदा है उनका डर है, मरे हुए का कोई डर नहीं होता।”

-मोहम्मद मियां

मोहम्मद मियां ने सिगरेट जला कर मुझसे पूछा, “कब है मिलिट्री की परीक्षा मॊमूर साहब?”
मोमूर: “बस आने ही वाली है।” 
मोहम्मद मियां: “तो यह लम्हें अच्छे से जी लो। पास हो गए तो पता नहीं कब मिलेंगे। मिलेंगे भी या नहीं।”  मॊमूर: “ऐसा मत कहो। मुझे परिक्षा नहीं देनी।” 
मोहम्मद मियां: “फ़िज़ूल की बातें मत करो। सेना में जाना बहुत फ़क्र की बात होती है, वर्दी पहनेंगे – बंदूक पकड़ोगे, हम आज़ाद हैं तो उन नौजवानों की वजह से ही। 
मोमूर: “कौन सी आज़ादी, मोहम्मद मियां! हम यहां बस फ्रीडम और जस्टिस के नारे लगाते हैं, जान सिर्फ़ जवानों की जाती है। फ़र्क बस इतना होता है कि कफ़न की जगह फौजी झंडे में लिपट कर वापस आता है। उसे सम्मान दे दिया जाता है, पर उसके बाद क्या! मुझे नौकरी लेनी होती तो मेरे पास पहले ही मौका था। बाबा के साथ जो वाक्य हुआ वह कभी विस्मृत नहीं हो सकता। बस एक सरकारी नौकरी के लिए मैं अपने घर से दूर नहीं जा सकता।” 
मोहम्मद मियां: “तो क्या करोगे?” 
मोमूर: “सोचा नहीं।” 
मोहम्मद मियां: “सोच कर बताना।” 
मोमूर: “जी। अभी के लिए चलता हूं।” 
मोहम्मद मियां: “तुम बहुत अच्छा गाते हो और गाने भी अच्छे लगते हो। खैर, शहर जाने से पहले मिल कर जाना।” 
मोमूर: “जी। चल मुर्हिका!!.” 

वापस चलते-चलते, मुर्हिका ने मुझसे कहा, “मोहम्मद काका सही कहते हैं, तुम गाने अच्छे गाते हो और लिखते भी अच्छे हो। वह क्या था…” मुर्हिका गाना गुनगुनाते हुए, “पतंग के मांजे की तरह, बिखरा सा…” मुर्हिका अपनी आदतों से बाज़ नहीं आती। डांटते हुए स्वर में उसका कान मरोड़ते हुए मैंने उससे कहा, “कितनी बार कहा है मेरे सामान को हाथ मत लगाया कर।” 
मुर्हिका (चिल्लाते हुए, रोने के स्वर में): “आ!!! मोमी… तेरी किताब बाहर ही रखी हुई थी, पन्ने बिखरे पड़े थे, नजर चली गई। आ!!! मेरा कान!!” 
मोमूर: “अच्छा ठीक है पर सुन..” 
मुर्हिका: “क्या?” 
मोमूर (फुसफुसा-कर) : “कुछ सुनाई दिया..? शायद कोई हमारे पीछे खड़ा है। मुझे महसूस हो रहा है।” 
मुर्हिका ( डरते हुए बोली) : “ककक कहा!!!!”
मोमूर (उसको और डराते हुए) : “तेरे पीछे!!”
मुर्हिका (चिल्लाते हुए, फुट कर रोती हुई): “मोमी!!!! मां !!!!!”
और फिर हम दोनों ने घर तक दौड़ लगाई।


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